एक अनोखा रहस्य - ब्रह्माकुमारियाँ शंकरजी को क्यों नहीं मानती?


प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय आज एक विश्वव्यापी विश्वविख्यात संस्था है। इस संस्था का मुख्य चिह्न है - त्रिमूर्ति शिव का चित्र। इस चित्र में निराकार परमपिता परमात्मा शिव के तीन दिव्य कर्तव्यों के साथ-साथ इस सृष्टि पर सन् 1936-37 से चल रहे ईश्वरीय कार्य के भूत, वर्तमान और भविष्य काल की भी पूर्ण जानकारी है। वास्तव में इस परिवार की स्थापना सबसे पहले निराकार परमपिता परमात्मा शिव ने इस संस्था के लोक-विख्यात संस्थापक ब्रह्मा उर्फ दादा लेखराज द्वारा सिंध हैद्राबाद में नहीं, अपितु उनके व्यावसायिक भागीदार के द्वारा सन् 1936-37 में कलकत्ता में की थी। स्थापना के कुछ ही समय पश्चात् यह ईश्वरीय परिवार अविभाजित भारत के तत्कालीन सिंध प्रांत में स्थानांतरित हो गया। वहाँ कुछ वर्षों तक निराकार शिव का माध्यम बनने के बाद सन् 1942 में दादा लेखराज के भागीदार का निधन हो गया। जब तक उस भागीदार के द्वारा परमात्मा ने ज्ञान सुनाया तब तक तत्कालीन अनुयायियों में वे पिऊ के नाम से प्रसिध्द थे।
तत्पश्चात्, कुछ वर्षों बाद दादा लेखराज के तन के द्वारा परमात्मा शिव ने ज्ञान सुनाना आरंभ किया जो कि सन् 1969 में दादा लेखराज के देहावसान तक जारी रहा। यह ईश्वरीय परिवार पाकिस्तान से माउंट आबू, राजस्थान स्थानांतरित होने पर ‘ऊँ मंडली’ के स्थान पर ‘प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय’ कहलाने लगा। ब्रह्मा उर्फ दादा लेखराज की कोमल, मातृ वात्‍सल्‍य वाली पालना में इस ईश्वरीय परिवार के सदस्यों ने संस्था के वास्तविक संस्थापक अर्थात् उनके भागीदार उर्फ पिऊ को भुला दिया और दादा लेखराज को ही निराकार शिव की तीन साकार मूर्तियों में से पहली मूर्ति अर्थात् प्रजापिता ब्रह्मा मान लिया; किंतु वह तो केवल अस्थायी या टेम्पररी भूमिका थी, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी स्कूल के प्रधानाचार्य की अनुपस्थिति में उप प्रधानाचार्य को प्रधानाचार्य की ड्यूटी सम्भालनी पड़ती है। दादा लेखराज के निधन के पश्चात् वही भागीदार वाली आत्मा इस ईश्वरीय यज्ञ में पुन: प्रवेश करती है और भिन्न नाम-रूप से त्रिमूर्ति शिव की दूसरी मूर्ति अर्थात् शंकर की भूमिका अदा करती है; किंतु दादा लेखराज के निधन के पश्चात् ब्रह्माकुमारी संस्था की सरपरस्त ब्रह्माकुमारियाँ परमात्मा की इस नई भूमिका को अस्वीकार कर देती हैं, जबकि स्वयं दादा लेखराज के द्वारा निराकार शिव ने दिनांक 14.05.72 की ज्ञान मुरली में ब्रह्माकुमारी संस्था की मुखिया दादी प्रकाशमणि (कुमारिका½ को सम्बोधित करते हुए पूछा था, ''कुमारका बताओ शिवबाबा के कितने बच्चे हैं? कोई कहते हैं 500 करोड़। कोई कहते एक बच्‍चा ब्रह्मा (दादा लेखराज½ है। क्या शंकर बच्चा नहीं है? ...... तुम शंकर को क्यों छोड़ देती हो? भल त्रिमूर्ति कहते हैं, परन्तु आक्युपेशन तो अलग-अलग है ना।''
अपनी दूसरी मूर्ति शंकर के द्वारा निराकार ज्‍योतिर्बिंदु शिव विश्व के आदि, मध्य और अंत के ऐसे गुह्य रहस्य समझा रहे हैं, जो कि दादा लेखराज के द्वारा नहीं सुनाए गए थे। साथ ही वे श्री कृष्ण जैसे गृहस्थी के रूप में अर्जुन जैसे गृहस्थियों को नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनने का मार्ग अर्थात् सहज राजयोग सिखा रहे हैं, जिससे आकर्षित होकर सैकड़ों ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ भोलेनाथ शिव-शंकर के कंपिल, (उ0प्र0½ स्थित आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय में शामिल हो रहे हैं। सच्चे ज्ञान के डमरू से अपने सिंहासन को डोलता हुआ देखकर ब्रह्माकुमारी संस्था के सरपरस्त शंकर को निराकार शिव की साकार मूर्ति मानने को ही तैयार नहीं होते और दादा लेखराज उर्फ तथाकथित ब्रह्मा, जिसकी भक्तिमार्ग में नगण्य मूर्ति पूजा दिखाई गई है, को ही भगवान का रूप मानते हैं, जबकि दादा लेखराज तो हार्ट-अटैक के कारण सन् 1969 में ही शरीर छोड़ चुके हैं। चतुर्युगी सृष्टि चक्र के अंत में अर्थात् पुरुषोत्तम संगमयुग पर निराकार परमपिता परमात्मा शिव इस जगत में आकर शंकर की भूमिका अदा करने वाली आत्मा के शरीर के द्वारा ही विश्व में प्रत्यक्ष होते हैं, इसलिए द्वापरयुग से शुरू हुए भक्तिमार्ग में निराकारी शिव और आकारी शंकर को मिलाकर एक कर दिया गया है। उसकी गाँव-गाँव में पूजा होती है और विश्व भर में हुई पुरातात्विक खुदाइयों में नग्न शंकर उर्फ तीर्थंकर की ही मूर्तियाँ मिली हैं जो कि अभी संगमयुग पर शंकर के देहभान रूपी वस्त्रों को पूर्णतया भुला देने की यादगार है। जो व्यक्ति कभी संसार में रहकर सर्वोत्‍तम विश्वकल्याणकारी कार्य करके गया है, उसी की मूर्तियाँ या मंदिर बनते हैं और पूजा होती है।
अत: ब्रह्माकुमारियों द्वारा करोड़ों रुपये खर्च करके शरीर छोड़ चुके दादा लेखराज का ब्रह्मा या भगवान के साकार माध्यम के रूप में प्रचार-प्रसार करने मात्र से इस धरती पर भगवान के दिव्य अवतरण को सिध्द करना संभव नहीं है। निराकार भगवान शिव के वर्तमान चैतन्य मनुष्य रथ अर्थात् शंकर को तो हम सभी केवल ईश्वरीय ज्ञान के अपने-अपने तीसरे नेत्र के द्वारा उनकी अनोखी कथनी और करनी की समानता से ही पहचान सकते हैं।
आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय